
बहुत से लोगों को देखा है कि वो तिलावत के बाद कुरआन मजीद को हिफाज़त के साथ महफूज़ जगह पर रख देते हैं, पर हम जो कुरआन या कुरआन की आयात् हिफ्ज़ कर लेते हैं उनकी हिफाज़त क्यूँ नहीं करते? क्यूँ नहीं हम उस जगह की हिफाज़त करते जहाँ हमने आयात् हिफ्ज़ करके रखी है, हम उसी जगह पर कुरआन की आयात् को रखते हैं जहाँ पर किना, फरेब, नफरत, बदनीयती, बेईमानी और हसद रखते हैं, हम उसी मुह से तिलावत भी करते हैं और उसी से गाली भी बकते हैं, कुरान की हिफाज़त तो हम उचाई पर रख कर कर देते हैं पर हम उस कुरआन की हिफाज़त क्यूँ नहीं करते जो हमारे दिलों में हिफ्ज़ है ! इसलिए मेरी गुजारिश उन सभी लोगों से है कि वो इस इस दिल और ज़बान का ख्याल रखें और हिफाज़त करें उस कुरआन की जो आप के सीने में हिफ्ज़ है !
